आतंकवाद और प्रशासन

हर बार कि तरह आतंकवादी इस बार भी अपने पूरे ऑपरेशन को सफल बना गए … और सारा भारत देश   उनका तांडव लगातार देखता रहा … सर पकड़ के असहाय ! ये कोई पहली बार नही है …. ये हर बार होता है … अब तो हर महीने … और आगे भी होगा …लेकिन प्रसाशन  .. वही कि वही.. वैसा का वैसा …! बस शान्ति और अहिंसा का नाम ले कर बार बार अपनी छवि को बचाता हुआ… ! हकीकत तो यह है कि ये शासन  में बैठे लोग डरपोक है .. और अपनी नपुंसकता को छिपाने के लिए गाँधी जी के सिद्धांतो का हवाला देते रहते है… !  गाँधी जी के सत्य शान्ति और अहिंसा का मतलब डरपोक बन के रहना तो कभी नही था… लेकिन क्या करे … जिसको जो मतलब निकलना है निकालता रहे .. गांधीजी तो अब रहे नही पूछने के लिए !

हर बार … हर साल ना जाने कितनी जाने जा रही है .. लेकिन प्रधान मंत्री से ले के पार्षद तक , कोई भी आत्नाक्वाद से लड़ने के लिए कोई ठोस नीति बनने की इच्छा नही रखते .. कोई कोशिश नही .. कोई कानून नही .. कोई संवेदना नही..!

वो दिन कब आएगा जब शासन में बैठे इन दिग्गज नेताओ को आतंकवादी निशाना बनाये और इन नामर्दों के बदले कोई हिम्मतवाला और मजबूत आदमी उनकी जगह ले…! एक बार मौका आया भी था जब संसद पर हमला हुआ था… लेकिन जाबाज हिम्मत वाले मर्द तो संसद के बाहर खड़े थे… और उन्होंने आतंकवादियो को बहार ही ढेर कर दिया… अंततः अन्दर बैठे डरपोक लोग तो बच गए और अगले दिन से फ़िर आने लगे…!
वैसे ये बात साफ़ तौर पर आतंकवादी भी जानते है कि अगर वे इन नेताओ को निशाना बनायेगे तो नुक्सान उनका ही होना है… उनकी आतंवादी गतिविधिया चलती रहे …उसके लिए इन नेताओ के हाथ में देश कि बागडोर होना जरुरी है….नही तो कोई सही जाबाज के हाथ में सत्ता चली गई तो सारी आतंकवाद की बंद कर देगा..!

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